CJI Surya Kant News: भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने आर्थिक अपराध और मनी लॉन्ड्रिंग से निपटने में सामने आ रही चुनौतियों पर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि मनी लॉन्ड्रिंग के जरिए बाहर जाने वाले हर 100 रुपये में से जांच एजेंसियां और संबंधित अधिकारी करीब 1 रुपया ही बरामद कर पाते हैं। उन्होंने इसके पीछे आर्थिक अपराधियों के तेजी से बदलते तौर-तरीकों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की सीमाओं को प्रमुख चुनौती बताया।
CJI सूर्यकांत ने शनिवार को कैम्ब्रिज में आयोजित 43वें International Symposium on Economic Crime को संबोधित करते हुए यह टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि भारत के पास आर्थिक अपराधों से निपटने के लिए व्यापक कानूनी और अनुपालन व्यवस्था मौजूद है, लेकिन अवैध तरीके से अर्जित संपत्ति की वास्तविक रिकवरी अब भी बेहद कम है।
उन्होंने कहा कि सम्मेलन का विषय ही एक अहम सवाल खड़ा करता है कि इतनी बड़ी लागत, जोखिम और व्यापक अनुपालन व्यवस्था के बावजूद अवैध संपत्ति की बरामदगी इतनी कम क्यों है।
सदियों पहले कौटिल्य ने भी दी थी चेतावनी
अपने संबोधन में CJI सूर्यकांत ने प्राचीन भारतीय राजनेता और अर्थशास्त्री कौटिल्य के अर्थशास्त्र का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि करीब दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व लिखे गए इस ग्रंथ में सरकारी अधिकारियों द्वारा राज्य के खजाने से धन निकालने के लगभग 40 अलग-अलग तरीकों का उल्लेख मिलता है।
उन्होंने कौटिल्य की उस सीख का हवाला दिया, जिसमें सरकारी अधिकारी के लिए राजा के राजस्व की देखरेख करते हुए उसमें से कुछ न लेना उतना ही कठिन बताया गया है, जितना जीभ पर रखे शहद या जहर का स्वाद लिए बिना रहना।
CJI ने कहा कि कौटिल्य ने ऐसी गड़बड़ियों को रोकने के लिए ऑडिट, क्रॉस-चेक और अवैध तरीके से अर्जित संपत्ति की जब्ती जैसे उपायों पर जोर दिया था। इससे यह स्पष्ट होता है कि आर्थिक अपराध और भ्रष्टाचार से जुड़ी चुनौतियां आधुनिक दौर की नई समस्या नहीं हैं।
अंतरराष्ट्रीय सहयोग की कमी बड़ी चुनौती
CJI सूर्यकांत ने कहा कि आज आर्थिक अपराधी पैसे और संपत्तियों को एक देश से दूसरे देश में स्थानांतरित करने के लिए बेहद जटिल और आधुनिक तरीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। ऐसे में केवल घरेलू कानूनों के सहारे अवैध संपत्ति की पूरी रिकवरी करना मुश्किल है।
उन्होंने बताया कि भारत ने दूसरे देशों के साथ प्रत्यर्पण और Mutual Legal Assistance जैसे समझौते किए हैं। इसके बावजूद आर्थिक अपराधियों को वापस लाने और विदेशों में मौजूद अवैध संपत्तियों की बरामदगी में अपेक्षित सफलता हासिल करना चुनौती बना हुआ है।
उन्होंने देशों के बीच बेहतर समन्वय, सूचनाओं के तेजी से आदान-प्रदान और कार्रवाई में तेजी की जरूरत पर जोर दिया।
नीरव मोदी और विजय माल्या का उदाहरण
आर्थिक भगोड़ों के प्रत्यर्पण की चुनौती का जिक्र करते हुए विजय माल्या और नीरव मोदी के मामलों को प्रमुख उदाहरण माना जा सकता है। भारत ने विजय माल्या के प्रत्यर्पण की प्रक्रिया ब्रिटेन के साथ 2017 में शुरू की थी। वहीं नीरव मोदी के मामले में भी ब्रिटेन में लंबे समय से कानूनी प्रक्रिया चल रही है।
भारत सरकार के मुताबिक, नीरव मोदी के खिलाफ ब्रिटेन में चल रही कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद प्रत्यर्पण से जुड़ी प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।
हालांकि, आर्थिक अपराधों से जुड़े मामलों में भारत को संपत्ति की रिकवरी में कुछ सफलता भी मिली है। प्रवर्तन निदेशालय के अनुसार, विजय माल्या मामले में ₹14,131.60 करोड़ और नीरव मोदी मामले में ₹1,112.91 करोड़ की संपत्ति बहाल की गई है।
CJI सूर्यकांत की टिप्पणी का व्यापक संदेश यही रहा कि आर्थिक अपराध से निपटने के लिए केवल मजबूत कानून बनाना पर्याप्त नहीं है। अवैध धन को समय रहते ट्रैक करना, फ्रीज करना और अंततः उसकी रिकवरी सुनिश्चित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
संसद मार्च की हिंसा पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
इसी बीच संसद मार्च के दौरान हुई झड़पों और जंतर-मंतर पर लगातार हो रहे प्रदर्शनों से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को अहम टिप्पणी की। अदालत ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शनों और 20 जुलाई को कथित NEET पेपर लीक के विरोध में निकाले गए संसद मार्च के दौरान हुई हिंसा से संबंधित मामलों की सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार से जवाब मांगा।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह इस बात पर भी विचार करेगा कि क्या जंतर-मंतर अभी भी विरोध प्रदर्शन के लिए उपयुक्त स्थान है। अदालत ने प्रदर्शन के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़े पहलुओं पर भी केंद्र से जवाब मांगा।
