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आरक्षण में उप-वर्गीकरण का पूरा मुद्दा क्या है? OBC से लेकर SC-ST तक, जानिए राज्यों ने अब तक क्या कदम उठाए

by | Sep 1, 2026 | ट्रेंडिंग, बड़ी ख़बरें

Reservation Sub-Classification: आरक्षण में सुधार और इसके लाभ को अधिक समान रूप से बांटने की मांग के बीच आरक्षण के भीतर उप-वर्गीकरण का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। इसे आम भाषा में ‘आरक्षण के भीतर आरक्षण’ कहा जाता है। इसका मकसद किसी आरक्षित वर्ग के भीतर उन समुदायों को अलग हिस्सा देना है, जो सामाजिक, शैक्षणिक या आर्थिक रूप से अपेक्षाकृत अधिक पिछड़े हैं और जिन्हें मौजूदा आरक्षण का पर्याप्त लाभ नहीं मिल पा रहा है।

OBC के भीतर उप-वर्गीकरण की व्यवस्था कई राज्यों में पहले से लागू है। वहीं, सुप्रीम कोर्ट के अगस्त 2024 के ऐतिहासिक फैसले के बाद राज्यों को SC और ST के भीतर भी उप-वर्गीकरण करने का रास्ता साफ हुआ है। इसके बाद कई राज्य इस दिशा में कानून और आंकड़े जुटाने की प्रक्रिया आगे बढ़ा रहे हैं।

क्या है आरक्षण में उप-वर्गीकरण?

सरल शब्दों में, उप-वर्गीकरण का मतलब पहले से आरक्षण प्राप्त किसी श्रेणी के भीतर अलग-अलग उप-समूह बनाकर आरक्षण के लाभ को उनके बीच बांटना है।

मिसाल के तौर पर, अगर किसी राज्य में OBC के लिए 27 फीसदी आरक्षण है, तो उप-वर्गीकरण के तहत इस 27 फीसदी को अलग-अलग समूहों में बांटा जा सकता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अपेक्षाकृत अधिक पिछड़े समुदायों को भी आरक्षण का उचित लाभ मिल सके।

इसके समर्थकों का तर्क है कि एक ही आरक्षित श्रेणी के भीतर सभी समुदायों की सामाजिक और शैक्षणिक स्थिति समान नहीं है। कुछ समुदाय आरक्षण का बड़ा हिस्सा हासिल करने में सफल रहे हैं, जबकि कुछ अन्य अभी भी पर्याप्त प्रतिनिधित्व से वंचित हैं।

OBC के भीतर उप-वर्गीकरण की शुरुआत कब हुई?

OBC के भीतर उप-वर्गीकरण की चर्चा आज की नहीं है। 1953 में गठित प्रथम पिछड़ा वर्ग आयोग यानी काका कालेलकर आयोग ने भी पिछड़े वर्गों के भीतर अत्यंत पिछड़े समुदायों की पहचान करने की सिफारिश की थी। आयोग ने 2,399 OBC जातियों में से 837 को ‘अत्यंत पिछड़ा वर्ग’ के रूप में चिन्हित किया था। हालांकि, सरकार ने आयोग की रिपोर्ट को स्वीकार नहीं किया।

इसके बाद 1979 में गठित बीपी मंडल आयोग के सामने भी यह मुद्दा उठा। आयोग के सदस्य एलआर नाइक ने असहमति नोट के जरिए OBC के भीतर उप-वर्गीकरण की जरूरत पर जोर दिया था।

मंडल आयोग ने 1980 में अपनी रिपोर्ट सौंपी। इसके आधार पर 1990 में वीपी सिंह सरकार ने केंद्र सरकार की नौकरियों में OBC के लिए 27 फीसदी आरक्षण लागू करने का फैसला किया। इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।

1992 में इंद्रा साहनी बनाम भारत सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने OBC आरक्षण को संवैधानिक रूप से वैध माना। बाद में 93वें संविधान संशोधन के जरिए OBC आरक्षण का विस्तार केंद्रीय शैक्षणिक संस्थानों तक किया गया।

रोहिणी आयोग ने क्या कहा?

OBC आरक्षण के लाभ को अधिक समान रूप से बांटने की मांग को देखते हुए केंद्र सरकार ने 2017 में जस्टिस जी. रोहिणी की अध्यक्षता में आयोग का गठन किया। इसका उद्देश्य OBC की केंद्रीय सूची के भीतर उप-वर्गीकरण की संभावनाओं का अध्ययन करना था।

आयोग ने जुलाई 2023 में अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंप दी, लेकिन उस पर अब तक अंतिम निर्णय नहीं हुआ है।

आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, OBC आरक्षण के तहत नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में मिले लाभ का लगभग 97 फीसदी हिस्सा करीब 25 फीसदी OBC समुदायों तक सीमित रहा। वहीं, केंद्रीय OBC सूची में शामिल 983 समुदायों का केंद्रीय नौकरियों और उच्च शिक्षा में प्रतिनिधित्व शून्य बताया गया।

राज्यों में OBC उप-वर्गीकरण की स्थिति

केंद्र में रोहिणी आयोग से काफी पहले कई राज्यों ने OBC के भीतर उप-वर्गीकरण लागू कर दिया था।

  • बिहार: OBC को पिछड़ा वर्ग और अत्यंत पिछड़ा वर्ग में बांटने की व्यवस्था की गई।
  • कर्नाटक: राज्य में OBC के लिए अलग-अलग श्रेणियों की व्यवस्था लागू की गई।
  • तमिलनाडु: OBC के भीतर तीन उप-श्रेणियां बनाई गई हैं।
  • आंध्र प्रदेश और कर्नाटक: दोनों राज्यों में OBC के लिए पांच-पांच उप-श्रेणियों की व्यवस्था का उल्लेख किया गया है।

बिहार में कर्पूरी ठाकुर सरकार ने 1978 में मुंगेरी लाल आयोग की सिफारिश के आधार पर पिछड़ा और अत्यंत पिछड़ा वर्ग की व्यवस्था लागू की थी। बाद में इस व्यवस्था को लेकर राजनीतिक और कानूनी विवाद भी हुआ।

नीतीश कुमार सरकार ने 2006 में बिहार पंचायती राज व्यवस्था में अत्यंत पिछड़ा वर्ग के लिए 20 फीसदी आरक्षण का प्रावधान किया। इससे स्थानीय निकायों में EBC के लिए अलग प्रतिनिधित्व की व्यवस्था मजबूत हुई।

SC-ST के भीतर उप-वर्गीकरण का विवाद

SC और ST के भीतर उप-वर्गीकरण का मुद्दा भी कई दशकों पुराना है। पंजाब सरकार ने 1975 में अनुसूचित जाति के आरक्षण के भीतर वाल्मीकि और मजहबी सिख समुदायों के लिए अलग व्यवस्था करने की कोशिश की थी।

2000 में आंध्र प्रदेश सरकार ने SC आरक्षण को चार उप-समूहों में बांटने के लिए कानून बनाया। हालांकि, 2004 में सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने ईवी चिन्नैया बनाम आंध्र प्रदेश सरकार मामले में इस कानून को रद्द कर दिया।

उस समय कोर्ट ने माना था कि संविधान के अनुच्छेद 341 के तहत राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचित SC समुदाय एक समरूप समूह हैं और राज्य सरकारें इस सूची के भीतर उप-वर्गीकरण नहीं कर सकतीं।

2024 में सुप्रीम कोर्ट ने बदला रुख

SC-ST उप-वर्गीकरण को लेकर 2004 के फैसले पर 2020 में सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय पीठ ने पुनर्विचार की जरूरत मानी। इसके बाद मामला सात सदस्यीय संविधान पीठ के पास गया।

1 अगस्त 2024 को सुप्रीम कोर्ट की सात सदस्यीय संविधान पीठ ने राज्यों को SC और ST के भीतर उप-वर्गीकरण की अनुमति दे दी। कोर्ट ने कहा कि राज्यों के पास ऐसा करने का संवैधानिक अधिकार है, लेकिन यह वर्गीकरण मनमाना नहीं हो सकता। इसके लिए ठोस और विश्वसनीय आंकड़ों का आधार जरूरी होगा।

फैसले के बाद राज्यों ने क्या कदम उठाए?

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद कई राज्यों ने SC के भीतर उप-वर्गीकरण की दिशा में कदम उठाए हैं।

तेलंगाना ने 2025 में ‘तेलंगाना अनुसूचित जाति (आरक्षण का युक्तिकरण) अधिनियम, 2025’ को लागू किया। पंजाब और तमिलनाडु में भी SC उप-वर्गीकरण से जुड़ी व्यवस्था पहले से मौजूद रही है।

इसके अलावा हरियाणा, बिहार और उत्तर प्रदेश समेत कुछ अन्य राज्य भी SC के भीतर उप-वर्गीकरण की संभावनाओं पर काम कर रहे हैं और इसके लिए समुदायों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति तथा प्रतिनिधित्व से जुड़े आंकड़े जुटाने की प्रक्रिया में हैं।

क्यों अहम है उप-वर्गीकरण?

उप-वर्गीकरण के समर्थकों का कहना है कि आरक्षण का उद्देश्य केवल एक वर्ग को आरक्षण देना नहीं, बल्कि सबसे वंचित समुदायों तक अवसर पहुंचाना भी है। यदि आरक्षित वर्ग के भीतर कुछ समुदाय लगातार अधिक लाभ हासिल कर रहे हैं और कुछ समुदायों का प्रतिनिधित्व बेहद कम है, तो उप-वर्गीकरण के जरिए लाभ का अधिक समान वितरण किया जा सकता है।

हालांकि, इसके साथ चुनौती यह भी है कि उप-वर्गीकरण के लिए सही और विश्वसनीय आंकड़े उपलब्ध हों तथा वर्गीकरण संवैधानिक और गैर-मनमाना हो। यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट ने भी SC-ST उप-वर्गीकरण को ठोस आंकड़ों के आधार से जोड़ते हुए राज्यों के लिए स्पष्ट सीमाएं तय की हैं।

इस तरह आरक्षण में उप-वर्गीकरण का मूल सवाल यही है कि आरक्षण का लाभ उन समुदायों तक कैसे अधिक प्रभावी ढंग से पहुंचे, जो आरक्षित श्रेणी के भीतर भी लंबे समय से अपेक्षाकृत अधिक वंचित रहे हैं।

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