सियासत का ‘झोल’ और जवानी का मर्डर
देश में आज अगर सबसे सस्ती कोई चीज है, तो वह है एक बेरोजगार छात्र की जिंदगी और उसका भविष्य। सत्ता और विपक्ष के वातानुकूलित कमरों में बैठकर जो राजनीतिक शतरंज बिछाई जा रही है, उसका सबसे बड़ा मोहरा और शिकार आज का युवा है। हाल की घटनाओं ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि इस सिस्टम में छात्र होना किसी श्राप से कम नहीं है।
सियासी पाखंड- तुम्हारा प्रोटेस्ट फर्जी, हमारा जायज!
जब सड़क पर उतरा युवा अपने हक की आवाज बुलंद करता है, तो राजनीतिक दलों के चश्मे का नंबर अचानक बदल जाता है। इस नंगे पाखंड को देखिए:
- बीजेपी का स्टैंड: “जंतर-मंतर पर जो प्रदर्शन कर रहे हैं, वे तो छात्र हैं ही नहीं!” (यानी जो सवाल पूछे, वह रातों-रात फर्जी या उपद्रवी बन जाता है।)
- विपक्ष का स्टैंड: “झारखंड प्रोटेस्ट में छात्रों की मांगें एकदम जायज हैं, हम पूरी तरह समर्थन करते हैं… पर हम सरकार के साथ भी हैं।” (यानी सहानुभूति भी दिखानी है और सत्ता का सुख भी नहीं छोड़ना है।)
यह दोहरा चरित्र साफ बताता है कि छात्रों का दर्द इनके लिए सिर्फ एक ‘चुनावी इवेंट’ है, जिसे ये अपने-अपने हिसाब से भुनाना चाहते हैं।
मुद्दों की हत्या और ‘व्हाटअबाउटिज्म’ की राजनीति
जब सवाल जवाबदेही का आता है, तो असली मुद्दे को भटकाने के लिए एक घटिया राजनीतिक स्क्रिप्ट तैयार कर ली जाती है:
- बीजेपी का सवाल: “अगर विपक्ष को इतनी ही चिंता है, तो राहुल गांधी झारखंड क्यों नहीं जा रहे हैं?”
- विपक्ष का पलटवार: “पहले ये बताओ कि मोदी जी मणिपुर क्यों नहीं जा रहे हैं?”
मणिपुर और झारखंड-दोनों ही ज्वलंत और गंभीर विषय हैं। लेकिन इन दोनों को एक-दूसरे की ढाल बनाकर छात्रों के असली मुद्दे को दफना देना कहां का न्याय है?
इन नेताओं की तू-तू, मैं-मैं से दूर, उस छात्र की असली त्रासदी देखिए जो सिस्टम की चक्की में हर तरफ से पिस रहा है। उसका पूरा जीवन एक खौफनाक चक्रव्यूह बन चुका है:
- इंतजार की सजा: पहले तो सालों-साल वैकेंसी और एग्जाम फॉर्म का इंतजार करो। उम्र निकलती जाती है और घर वालों के ताने बढ़ते जाते हैं।
- धांधली का शिकार: जैसे-तैसे फॉर्म आता है, खून-पसीना एक करके छात्र परीक्षा देता है, और शाम को पता चलता है कि सिस्टम के दलालों ने पेपर पहले ही बेच दिया था।
- जानवरों जैसा सलूक: जब वह इस अन्याय के खिलाफ सड़क पर उतरता है, तो सत्ता उसे जानवर समझकर पुलिस की लाठियों और वाटर कैनन से हांकती है।
- कोर्ट की भूलभुलैया: अंत में मामला कोर्ट की चौखट पर पहुंचता है। जहां ‘तारीख पर तारीख’ के खेल में छात्र की जवानी कब बुढ़ापे में बदल जाती है, किसी को पता नहीं चलता।
कब जागेगा सिस्टम?
आज का युवा सत्ता की रैलियों में भीड़ बढ़ाने वाला टूल नहीं है। उसे झूठी हमदर्दी नहीं, बल्कि पारदर्शी परीक्षाएं, समय पर रिजल्ट और पक्की नौकरी चाहिए। अगर हुक्मरानों ने छात्रों को सिर्फ वोटबैंक और कोर्ट-कचहरी में भटकने वाला जानवर समझना बंद नहीं किया, तो याद रखिए-सड़कों पर बहने वाला यह आक्रोश जिस दिन बैलेट बॉक्स तक पहुंचेगा, बड़े-बड़ों की सत्ता जड़ से उखड़ जाएगी।

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