जीवन में जब भी परेशानी आती है या फिर संकट के बादल छा जाते हैं तो आशा की किरण के तौर पर हमें संकटमोचन हनुमान की ही याद आती है। हनुमान जी उम्मीद की वह लौ बनते हैं, जो हमारे दिलों में आत्मविश्वास बनकर जगमगाने लगते हैं। हालांकि, क्या आपने कभी सोचा है कि जब लोग कहते हैं कि हनुमान जी त्रेता युग में जन्मे थे, तो मन में एक सवाल उठता है कि फिर ऐसा क्यों कहा जाता है कि “चारों युग परताप तुम्हारा”? आखिर चार युग तो हैं, सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग। हनुमान जी तो रामायण में प्रकट हुए, जो कि त्रेता युग की कथा है। फिर बाकी युगों में उनका प्रभाव कैसे रहा?
हनुमान जी कोई साधारण पात्र नहीं, बल्कि उन्हें अमरता का वरदान मिला है। वह चिरंजीवी हैं। यानी जब तक ये सृष्टि है, तब तक वे जीवित हैं। त्रेता युग में राम जी की सेवा करने के लिए उन्होंने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। लेकिन जैसे ही त्रेता युग समाप्त हुआ, वे कहीं चले नहीं गए। उनका अस्तित्व बना रहा, उनका पराक्रम फैला रहा।

