“मुझे खुद समझ नहीं आता कि मैं कैसी मां हूं। बच्चे से प्यार नहीं हो पाता, बल्कि उसे गोद में लेने से भी डर लगने लगा है। लोग कहते हैं, मां बनना सबसे सुंदर अहसास होता है, लेकिन मेरे लिए यह एक बोझ बन गया है।”
यह दर्द है एक नई मां का, जो पोस्टपार्टम डिप्रेशन से जूझ रही है। बच्चा होने के बाद उसका मानसिक संतुलन बिगड़ गया। लगातार रोना, अकेलापन महसूस करना और आत्मग्लानि जैसी भावनाएं उसे घेरे रहती हैं। पति और घरवाले उसका यह हाल समझने की बजाय उल्टा ताने देते हैं—”मां ऐसी होती है क्या? बच्चे से प्यार नहीं? तुम्हें तो मां बनने के लायक ही नहीं था।”
ऐसे में वह महिला खुद को बेहद अकेला महसूस करती है। उसे समझ नहीं आता कि क्या वह वाकई एक बुरी मां है या बस किसी मानसिक परेशानी से जूझ रही है। समाज में मां को एक आदर्श रूप में देखा जाता है—जिसे बच्चे से स्वाभाविक प्रेम होता है, जो त्याग की मूर्ति होती है। ऐसे में जो महिलाएं डिप्रेशन की वजह से मातृत्व को वैसे न निभा पाएं, उन पर उंगलियां उठाई जाती हैं।
डॉक्टरों के मुताबिक, यह पोस्टपार्टम डिप्रेशन है, जो बच्चे के जन्म के बाद हार्मोनल बदलाव के कारण होता है। इसका इलाज संभव है, लेकिन सबसे जरूरी है परिवार का साथ और समझदारी। हर मां की कहानी अलग होती है। जरूरी नहीं कि हर किसी का मातृत्व अनुभव एक जैसा हो। हमें समझना चाहिए, न कि जज करना।

