झारखंड के एक छोटे से गांव दाहू में जन्मी सीमा कुमारी की ये कहानी मोटिवेशन से भरपूर है| ये एक ऐसी कहानी है जिसे जो भी सुनेगा उसकी आंखों से आंसू जरूर आ जाएंगे|सीमा के परिवार में 19 सदस्य एक ही घर में रहते थे| माता-पिता धागा फैक्ट्री में मजदूरी कर के घर चलाते थे. आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि दो वक्त की रोटी मिल जाए तो बड़ी बात थी|सीमा के माता-पिता ने उनका दाखिला सरकारी स्कूल में कराया| सीमा घर के काम करतीं, मवेशी चराती, खेतों में काम करतीं और चावल की देसी बीयर बेचकर घर चलाने में हाथ बंटाती थीं|सीमा ने गरीबी, रूढ़ियों और बाल विवाह जैसी चुनौतियों का सामना करते हुए दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय हार्वर्ड तक का सफर तय किया|
बता दें कि सीमा के गांव दाहू में साल 2012 में एक NGO गांव में लड़कियों को फुटबॉल के ज़रिए सशक्त बनाने का कार्यक्रम लेकर आया|उस समय सीमा महज 9 साल की थीं| एक दिन घास काटते वक्त उन्होंने कुछ लड़कियों को फुटबॉल खेलते देखा और उससे जोड़ने की ठानी|फिर घरवालों की अनुमति से सीमा फुटबॉल खेलने लगीं| फिर मेहनत की, सीखा और फिर कई जिलास्तरीय और राज्यस्तरीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया|उसके बाद सीमा ने राष्ट्रीय स्तर तक खेला और फिर अंतरराष्ट्रीय कैंपों में भी भाग लिया और पढ़ाई को भी कभी नहीं छोड़ा| साल 2018 में उन्हें वाशिंगटन यूनिवर्सिटी के समर प्रोग्राम के लिए चुना गया| फिर 2019 में वह इंग्लैंड के कैंब्रिज यूनिवर्सिटी पहुंचीं| इसके बाद अमेरिका के एक एक्सचेंज प्रोग्राम में उनका चयन हुआ और उन्हें हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में स्कॉलरशिप मिली| वर्तमान में सीमा हार्वर्ड में अर्थशास्त्र की पढ़ाई कर रही हैं |

