भगवान श्रीराम केवल एक ऐतिहासिक या पौराणिक चरित्र नहीं हैं, बल्कि धर्म, नीति और मर्यादा के प्रतीक हैं। वे भगवान विष्णु के सातवें अवतार माने जाते हैं, जिनका अवतरण अधर्म के नाश और धर्म की स्थापना के लिए हुआ था। रामचरितमानस और वाल्मीकि रामायण में उनके जीवन के ऐसे अनेक प्रसंग हैं, जो हर व्यक्ति को सही राह दिखाने में सहायक हैं। श्रीराम के चरित्र में त्याग, करुणा, धैर्य, कर्तव्य और मर्यादा का समावेश है, जो उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम बनाता है।
भगवान राम ने शत्रु के प्रति भी करुणा दिखाई, जैसे रावण का वध करने के बाद विभीषण को लंका का राजा बनाकर उसका सम्मान किया। यह दर्शाता है कि मनुष्य को द्वेष और अहंकार से दूर रहकर करुणा और क्षमा का भाव अपनाना चाहिए।

