Son River Water Dispute Explained: बिहार और झारखंड के बीच सोन नदी के पानी के बंटवारे को लेकर करीब 25 वर्षों से चला आ रहा विवाद अब खत्म हो गया है। सोमवार को नई दिल्ली में दोनों राज्यों के बीच एक अंतर-राज्यीय समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए। समझौते के तहत सोन नदी के कुल जल आवंटन में से बिहार को 5.75 मिलियन एकड़-फीट (MAF) और झारखंड को 2 MAF पानी देने पर सहमति बनी है।
इस समझौते को दोनों राज्यों के लिए अहम माना जा रहा है। इससे दक्षिण बिहार के सिंचाई क्षेत्र को फायदा मिलने के साथ ही झारखंड के सूखा प्रभावित पलामू और गढ़वा इलाकों में जल परियोजनाओं को आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हो सकता है।
आखिर 25 साल से क्यों अटका था विवाद?
सोन नदी के पानी के बंटवारे का विवाद नवंबर 2000 में झारखंड के बिहार से अलग होकर नया राज्य बनने के बाद शुरू हुआ। राज्य के बंटवारे के बाद सोन नदी का ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र और उसकी कई सहायक नदियां झारखंड में चली गईं, जबकि नदी के निचले मैदानी और प्रमुख कृषि क्षेत्र बिहार में रह गए।
हालांकि, इस विवाद की पृष्ठभूमि इससे भी पुरानी है। वर्ष 1973 के बाणसागर समझौते के तहत मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और तत्कालीन अविभाजित बिहार के बीच सोन नदी के पानी का बंटवारा हुआ था। इसमें अविभाजित बिहार को कुल 7.75 MAF पानी आवंटित किया गया था।
लेकिन 2000 में बिहार के विभाजन के बाद इस 7.75 MAF हिस्से को बिहार और झारखंड के बीच किस अनुपात में बांटा जाए, इसे लेकर कोई स्पष्ट कानूनी और बाध्यकारी व्यवस्था नहीं थी। यही आगे चलकर दोनों राज्यों के बीच विवाद की बड़ी वजह बनी।
बातचीत होती रही, लेकिन नहीं बनी बात
पिछले करीब ढाई दशकों में विवाद सुलझाने के लिए कई अंतर-राज्यीय समितियों और अधिकारियों के स्तर पर बातचीत हुई। हालांकि, जलाशय की ऊंचाई, संभावित जलमग्न क्षेत्र, विस्थापन और दोनों राज्यों के हिस्से के पानी जैसे मुद्दों पर सहमति नहीं बन पाई।
बिहार की चिंता थी कि सोन नहर प्रणाली में पर्याप्त पानी नहीं मिलने से उसके कृषि क्षेत्रों की सिंचाई प्रभावित होती है। दूसरी ओर, झारखंड को आशंका थी कि जलाशय का जलस्तर या बांध की ऊंचाई बढ़ाने से पलामू और गढ़वा के कुछ इलाकों में जमीन डूब सकती है और लोगों का विस्थापन हो सकता है।
राजनीतिक स्तर पर भी अलग-अलग समय में दोनों राज्यों में अलग गठबंधन की सरकारें रहने के कारण इस मुद्दे पर अंतिम सहमति बनने में देरी हुई।
कैसे बनी 5.75 MAF और 2 MAF पर सहमति?
नए समझौते के तहत बिहार को 5.75 MAF और झारखंड को 2 MAF पानी देने पर सहमति बनी है। इसके साथ ही जलाशय के जलस्तर को एक निर्धारित सीमा में रखने और संभावित प्रभावित क्षेत्रों के लिए पुनर्वास के प्रावधानों पर भी सहमति बनी है।
इस समझौते से इंद्रपुरी बराज के संचालन और उससे जुड़ी सिंचाई व्यवस्था को भी मजबूती मिलने की उम्मीद है। यह बराज रोहतास जिले में डेहरी-ऑन-सोन से करीब 5 किलोमीटर ऊपर स्थित है और सोन नहर प्रणाली का प्रमुख स्रोत है।
इंद्रपुरी बराज से निकलने वाली नहरों के जरिए रोहतास, भोजपुर, बक्सर और कैमूर समेत शाहाबाद क्षेत्र के बड़े हिस्से में सिंचाई होती है। समझौते के बाद बिहार को कृषि क्षेत्र के लिए अतिरिक्त पानी उपलब्ध होने की उम्मीद है।
झारखंड को क्या फायदा होगा?
समझौते से झारखंड के सूखा प्रभावित पलामू और गढ़वा जिलों के लिए भी पानी की उपलब्धता बढ़ाने का रास्ता साफ हो सकता है। यहां नई नहर प्रणालियों और जल प्रबंधन से जुड़ी परियोजनाओं को आगे बढ़ाने की उम्मीद है।
वहीं, जलाशय का जलस्तर नियंत्रित रखने और पुनर्वास से जुड़े प्रावधानों के कारण संभावित जलमग्नता और विस्थापन की झारखंड की चिंता को भी संबोधित करने की कोशिश की गई है।
केंद्रीय जल आयोग की क्या रही भूमिका?
इस लंबे विवाद को सुलझाने में केंद्रीय जल आयोग (CWC) की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। आयोग ने दोनों राज्यों की पानी से जुड़ी जरूरतों को ध्यान में रखते हुए तकनीकी और जल-विज्ञान संबंधी अध्ययन किए। इसके आधार पर जल प्रबंधन और जलाशय के संचालन से जुड़े प्रस्ताव तैयार किए गए।
पहले भी कई बार मध्यस्थता के प्रयास हुए थे, लेकिन अंतिम सहमति नहीं बन सकी। इस बार दोनों राज्यों के बीच राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर बनी सहमति के साथ तकनीकी समाधान भी तैयार किया गया।
समझौते का क्या होगा असर?
सोन नदी जल विवाद के समाधान से दोनों राज्यों की लंबे समय से लंबित सिंचाई और जल परियोजनाओं को गति मिलने की उम्मीद है।
- बिहार को सोन नहर प्रणाली के जरिए सिंचाई के लिए अधिक सुनिश्चित जल उपलब्धता मिल सकती है।
- दक्षिण बिहार के रोहतास, भोजपुर और औरंगाबाद जैसे क्षेत्रों को फायदा होने की उम्मीद है।
- झारखंड के पलामू और गढ़वा जैसे सूखा प्रभावित जिलों में नई जल परियोजनाओं का रास्ता खुल सकता है।
- जलाशय के जलस्तर और पुनर्वास को लेकर झारखंड की चिंताओं के समाधान की व्यवस्था की गई है।
- 25 साल पुराने अंतर-राज्यीय विवाद के खत्म होने से दोनों राज्यों के बीच जल संसाधनों के बेहतर प्रबंधन की उम्मीद बढ़ी है।

आशीष कुमार सिंह पिछले 12 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। उन्होंने भारत टाइमिंग और दैनिक भास्कर जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में स्थापना काल से ही अपना योगदान दिया है। स्वतंत्र पत्रकार के रूप में काम करते हुए वे मुख्य रूप से राष्ट्रीय राजनीति पर गहन रिपोर्टिंग और विश्लेषण करते हैं।राष्ट्रीय राजनीति उनकी विशेष रुचि का विषय है। वे समसामयिक घटनाओं, राजनीतिक विकास और जनहित के मुद्दों पर तथ्यात्मक व निष्पक्ष पत्रकारिता करते हैं। समाचार पुलिस वेबसाइट पर उनके लेख और रिपोर्ट्स पाठकों को राष्ट्रीय मुद्दों की सही जानकारी उपलब्ध कराने का प्रयास करते हैं।आशीष कुमार सिंह का उद्देश्य सत्यनिष्ठा, निष्पक्षता और जनहित को ध्यान में रखकर पत्रकारिता करना है।
