तीर्थनगरी ऋषिकेश में दशहरे का पर्व सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि गंगा-जमुनी तहज़ीब का प्रतीक भी है। वर्ष 1960 से लगातार रहीम के बंदे यहां रावण, कुंभकर्ण और मेघनाथ के पुतले बनाते आ रहे हैं। शफीक बताते हैं कि उनके पिता 1964 में मुजफ्फरनगर से ऋषिकेश आए और आईडीपीएल दशहरे से इस परंपरा की शुरुआत हुई। अब उनकी तीसरी पीढ़ी भी इस काम को आगे बढ़ा रही है। धर्म विशेष का अंतर मिटाकर यह परिवार आपसी भाईचारे का संदेश दे रहा है। इस बार पुतलों में खास आतिशबाजियां लगाई गई हैं, ताकि दहन के समय दर्शकों को भव्य नजारा देखने को मिले। . . . .
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