दिल्ली हाईकोर्ट ने एक विवाह को अमान्य घोषित करते हुए कहा कि पत्नी द्वारा गंभीर चिकित्सीय तथ्य छिपाना वैवाहिक जीवन की मूल भावना के खिलाफ है। यह फैसला उस मामले में आया जहां पति ने आरोप लगाया था कि उसकी पत्नी ने शादी से पहले यह बात छिपाई कि उसके पास न तो गर्भाशय है और न ही बायां गुर्दा।
पति की ओर से दर्ज की गई याचिका में कहा गया कि विवाह के बाद एक मेडिकल जांच में यह खुलासा हुआ कि महिला के शरीर में गर्भाशय और बाईं किडनी मौजूद नहीं है। यह जानकारी पहले साझा नहीं की गई थी। मामला तीस हजारी फैमिली कोर्ट में पहुंचा, जहां से यह उच्च न्यायालय तक आया।
हाईकोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 12(1)(c) के तहत इस विवाह को धोखाधड़ी माना और इसे शून्य घोषित कर दिया। कोर्ट ने कहा कि इस तरह की महत्वपूर्ण जानकारी को छिपाना वैवाहिक सहमति को प्रभावित करता है और इसे धोखा माना जाएगा।
न्यायमूर्ति अनिल क्षेत्रपाल और हरीश वैद्यनाथन शंकर की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि एक शिक्षित महिला को मासिक धर्म की अनुपस्थिति जैसी स्थिति की जानकारी अवश्य होनी चाहिए थी, जो गर्भाशय की गैरमौजूदगी का संकेत देती है। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस प्रकार की चुप्पी विश्वासघात की श्रेणी में आती है।

